Friday, June 3, 2016

History of Lahul:Pages from my diary

मोरेवियन मिशनरी का लाहुल में योगदान 
                               
लाहुल  के उत्थान में मोरेवियन मिशनरी का अथाह  योगदान है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। ईसाई धर्म का यह मत रोमन चर्च के प्रोटेस्टेंट विचारधारा को मानता था। इस मिशनरी का मुख्यालय जर्मनी में था।  इन्होंने अपने मत के प्रचार के लिए सन 1846 में लाहुल में भी कदम रखा।इस मत को मानने वाले अधिकतर लोग इंग्लैंड और स्
के थे और प्रचार प्रसार के लिए सारा धन इंग्लैंड के एक कार्यालय से ही आता था।         
       यह लोग करीब एक सदी लाहुल में रह कर गए किन्तु हैरानी की बात यह है कि यह अपने मत को यहां फैला न सके।इस धर्म के अनुयायी बहुत ज्यादा शिक्षित थे और कुछ तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रख्यात लेखक और विद्वान थे।मोरेवियन लेखक जेयस्क और फ्रेंक तो बहुत ही मशहूर लेखक थे और ट्रांस हिमालय के अध्यन में इन दोनों का योगदान बहुत ही महत्वपूर्ण है। डा. ए.डी.एच.फ्रैंक की पुस्तक "the antiquities of Indian Tibbet"बहुत ही बहुमूल्य पुस्तक है जिस में उन्होंने तिब्बत,लदाख और लाहौल की संस्कृति-सभ्यता पे रौशनी डाली है। 

             इन्होंने  भोटी और तिब्बती भाषा का अध्यन्न किया और स्थानीय बोलियों के व्याकरण को समझा। इन्होने कुछ भोटी भाषा में लिखी गयी धार्मिक लेखों का अंग्रेजी में भी अनुवाद किया। कुछ मोरेवियन लेखकों ने तो भोटी भाषा में ही समस्त बाइबल का अनुवाद किया ताकि ईसाई मत के शिक्षाओं को लाहौल के स्थानीय जनता को समझाया जा सके और ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस धर्म की तरफ आकर्षित किया जा सके। ऐसा ही एक पोथी या दोबांग(भोटी में हस्त लिखित पांडुलिपि)पट्टन घाटी के गोहरमाँ  गाँव के लहारजे घराने में अभी भी सुरक्षित है।  
               
                 मोरेवियन मिशनरी 1846 से 1946 तक करीबन 100 वर्ष लाहौल में रहे और इन का मुख्यालय केलंग में था। इन्होने केलंग के समीप एक छोटा सा फार्म हॉउस भी बना रखा था जहां उन्होंने सर्वप्रथम लाहौल वालों को आलू बीज कर इस सब्जी से अवगत कराया। इन्होने रोजाना प्रार्थना के लिए लोअर केलंग में एक चर्च भी बनाया था। इन का मुख्य उदेश्य गरीब सम्प्रदायों का उद्धार करना था और इन की सेवा भाव बहुत ही अच्छी थी। इस सेवा भाव के पीछे वास्तविक मंशा मानवीय भी थी और अपने मत की तरफ ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ना भी उनका मुख्य लक्ष्य था। 

             इन्होने लाहौली समाज को सब्जियां उगाना सिखाया,स्वेटर और जुराबे बुनना,घरों में ऊँची खिड़कियाँ,तैल से जलने वाली लैम्प,घास के बने जूतों,नाली वाली तंदूरों,सूखे फ्लश(स्थानीय बोली में घोप) और मनुष्य मल इत्यादि को खाद के तौर पर प्रयोग करने के वैज्ञानिक उपाय बताए। इन्होने ही खेती-बाड़ी के नए-नए तरीकों से लाहौलियों को रूबरू कराया। इसी मत के ए.डब्ल्यू.हायडे ने सर्वप्रथम केलंग में आलू के बीज बो कर दिखाया था और यही यही सब्जियों का राजा बाद में लाहुलियों के आय का मुख्य स्त्रोत बना। इन मिशनरियों द्वारा बताए गये इन सुधारवादी ज्ञान की वजह से लाहौल वासियों के दैनिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आये जो आज तक कायम हैं और लाहौलवासी इन चीजों के लिए उन के कृतज्ञ हैं।  
                        
                          लाहौल में एक सदी बिताने और उपरोक्त सुधार-सेवा के बाबजूद  मोरेवियन मिशनरी अपना धर्म नहीं फेला सके और इस का मुख्य कारण शायद लाहौल वासियों की अपने पुराने धर्म के प्रति अटूट आस्था हो सकती है। लाहौल के उपरी घाटियों तिनन में घेपन राजा और तोद-गाहर घाटी में बुद्ध धर्म को मानने वालों की जड़े बहुत गहरी थी। पट्टन घाटी में हिंदू देवी-देवताओं जैसे कि शिव,पुण्यों की देवी,भेरों,केलिंग और खोड़ देव  को बहुत आस्था के साथ पूजा जाता रहा। इस बीच में आये इन ईसाई मत के प्रचारकों को सम्भवत:इसी कारण अपना मत फ़ैलाने में असफलता हाथ लगी। लाहौली जनता को मालूम  था कि इन इसाईओं का अपना एक खुदा है जिसे वे "इशीग-मिशिग"यानि के ईसा-मसीह कहते थे। 
मोरेवियन मिशनरी द्वारा लाया गया लदाक्पा परिवार
             कहते हैं कि इन की मेहनत-मशक्त जब काम नहीं आई तो इन्होने लदाख से एक परिवार को लाहौल में ला बसाया ताकि उन के द्वारा धर्म को फैलाया जा सके। उन्होंने इस परिवार का मुखिया जिस का नाम "जाजग फुन्चोग"था,को अपने 18 बच्चों या  रिश्तेदारों के साथ पट्टन घाटी के ठोलंग गांव में ठ्रोपा घराने से कुछ जमीन खरीद कर खेती-बाड़ी और गुजर-बसर के लिए दी। इन्हें लदाक्पा परिवार के नाम से जाना जाता था। इस परिवार के कुछ सदस्य बाद में यहीं ठोलंग गांव में स्वर्ग सिधारे और उन को गांव में ही दफनाया गया। 

                 अभी भी ठोलंग गांव के कुछ खेतों में उन की कब्रगाहें कायम हैं। मोरेवियन मिशिनरियों ने ठ्रोपा परिवार को बदले में या बेच कर केलंग के ऊपर कहीं जमीन दी थी। भारत देश की आजादी के बाद मोरेवियन मिशनरी के प्रचारक भी अपने मूल देशों को वापिस चले गये किन्तु ईसाई धर्म में परिवर्तित लदाक्पा परिवार के सदस्य लाहौल में स्थायी तौर पर बस गए। इन्होने भी बाद में बुद्ध धर्म  को अपना लिया और स्थानीय जनसमुदाय से विवाह-शादियाँ कर बस गए। 

        इसी घराने के सदस्य देचैन पलजोर ने अपना नाम बदल कर देवी सिंह रख लिया और कोई समुअल या शंमेल  नाम के सदस्य ने अपना नामकरण शेर सिंह रख लिया और पुलिस में भर्ती हो कर अपनी सेवाएँ दी। आज इस घराने  के वंशज लाहौली समाज  के जाने-माने प्रतिष्ठित परिवारों में एक है और इन की रिश्तेदारियां भी कई अच्छे घरानों से है। 

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