Thursday, May 19, 2016

सामाजिक विषय

 लाहौल-स्पीति में सयुंक्त परिवार प्रणाली की प्रासंगिकता


                                                                                                                  कुछ शब्द उपरोक्त विषय के बारे में:-
      इस विषय पर मैंने आज से चौदह वर्ष पूर्व यानी कि सन 1996 में लाहौली बुद्धिजीवियों द्वारा प्रकाशित "चंद्रताल"नामक त्रैमासिक पत्रिका हेतू लेख लिखा था और यह विषय लाहौली समाज के पढ़े-लिखे तबके के लोगों के मस्तिष्क पटल पे शायद कोतुहल मचा गया या नहीं ,यह तो मुझे नहीं पता,किन्तु चाय की चुस्कियां लेते समय बात-चीत का विषय जरूर बना होगा। जैसा कि इस  विषय का आधार एक वास्तविक और सवेदनशील पहलू की और था,जिस से हमारा लाहौली समाज रूबरू हो रहा था,अत:मुझे खुल के लिखने का मौका मिला था।आज हम नए युग में हैं जहां सामाजिक मूल्य बदल गये हैं,लोग वहीं हैं किन्तु हमारे जीवन जीने का तौर-तरीका बदल गया है।आधुनिकता ने हमें बहुत कुछ दिया है-अच्छा भी और बुरा भी।लोगों ने भी समय के साथ बदलना शुरू कर दिया है और यह आवश्यक भी है।आज वख्त की नजाख्त को देखते हुए लोगों ने अपने को नए परिवेश में ढाल लिया है किन्तु क्या हम सही दिशा में जा रहे हैं या गलत में,मेरे ख्याल से इस पर मंथन होना आवश्यक है.(कृपया मेरी हिंदी कमजोर है ,यदि कहीं व्याकरण में अशुद्धियां दिखाई दें,तो माफ़ करें)
      आज पुन:इस विषय पर प्रकाश डालने की चेष्ठा कर रहा हूँ क्योंकि अब इंटरनेट के जमाने में विचार और संवाद और दूर तक पहुंचाए जा सकते हैं।पुस्तकों में लेख छपाने की भी उतनी आवश्यकता नहीं है,सब घर बैठे या कहीं दूर से भी संवाद किया जा सकता है।आशा है आप सब इस विषय को पढ़ कर अपने विचार अवश्य प्रस्तुत करेंगे।

लाहौल-स्पीति का परिचय:
      बर्फ की श्वेत चादर से ढकी पीर-पंजाल की गगन-चुम्बी चोटियाँ,पहाड़ियों के चरणों को स्पर्श करती हुई चन्द्र और भागा नदियाँ और मनमोहक चनाव नदी की घाटी,कल-कल करते नाले,हरे-भरे दूर तक फेले सीढी नुमा खेत एवं इस प्राकृतिक व्यूह-रचना के मध्य निवास करती यहाँ की जन-जातीय जनता और उनका खून-पसीने को एक कर देने वाला कठिन परिश्रम,यही कुछ हिमालय के गोद में स्थित 'लाहौल-स्पीति'का संशिप्त सा परिचय है।

लाहौल-स्पीति की नितांत परिस्थितियाँ और पारिवारिक आधार:
             जैसा कि सर्वविदित है कि लाहौल-स्पीति भारत के उत्तरोतर राज्य हिमाचल का एक सीमांत जिला है और यहाँ की भौगोलिक स्थिति ही नहीं,अपितु सामाजिक,आर्थिक एवं धार्मिक परिस्थितियाँ भी दूसरे जिलों से सर्वथा भिन्न हैं।यहाँ का जीवन नितांत भिन्न एवं कठिन है।कठोर परिश्रम,खून-पसीने की कमाई,इसी में इन की रोज़ी-रोटी निर्भर करती है।दूर ऊँची पहाड़ियों से जल खेतों में पहुंचा कर,रात-दिन फसलों की देख-भाल करने व् कठोर परिश्रम के पश्चात ही सोने जैसे कुँठ,मटर,आलू,होप्सअन्य सब्जियों इत्यादि की फसल नसीब होती है।पूरी घाटी का जीवन इतना जटिल है कि बाहर का आदमी यहाँ के लोगों की मेहनत को देख कर दांतों तले ऊँगली दबाए बिना नहीं रह पाता।यही कारण है कि समाज के हर क्षेत्र में लोग हमेशा कंधे से कंधा मिला कर चलते आये हैं।विशेषकर 'संयुक्त परिवार प्रणाली'में रह कर यहाँ के लोग एक-दूसरे के दुःख-सुख के साथी रहे हैं।प्यार,सहयोग,आपसी ताल-मेल आदि वे विशेषताएं हैं,जिनकी बदोलत इस जिले में संयुक्त-परिवार प्रणाली सदियों से कायम रहती आई है।

बदलते सामाजिक और आर्थिक मूल्यों का असर :
      परन्तु आज परिस्थितियों में नितांत अनपेक्षित परिवर्तन आते जा रहे हैं।भोगौलिक परिस्थितियों की प्रतिकूलता के बावजूद आज यहाँ का पारिवारिक जीवन दिन-ब-दिन विघटित होता जा रहा है।घाटी निवासी पुरानी परम्परा को तिलांजलि देते जा रहे हैं।वे जान कर भी यह तथ्य भूल  रहे हैं कि एकता में शक्ति निहित है।किन्तु यह भी स्वाभाविक है कि बदलते सामजिक मूल्यों के कारण उन्हें संयुक्त परिवार प्रणाली में रहना अटपटा महसूस हो रहा है।
       इस के विपरीत सभी सामाजिक एकता को ताक में रख कर परिवार विघटित होते जा रहे हैं।भाई-भाई के मध्य आपसी रंजिश और मन-मुटाव दिन-ब-दिन बढता जा रहा है।समय आने पर भाईयों का एक छत के नीचे गुजर-बसर करना मानो एक घुटन एवं असहनीय पीड़ा समझा जा रहा है।लगभग हर वर्ष कानो-कान खबर मिल ही जाती है कि फलां घर के भाईयों में झगड़ा हुआ,जमीन व बाग़-बगीचे का बटवारा,फलां का पृथक घर बना कर सिर्फ अपने बीबी-बच्चों के साथ जीवन-यापन करना आदि-आदि।यह चीज़ें लाहौल-स्पीति के संस्कृति और संस्कारों पर प्रश्न बन कर उभर रहे हैं।आपसी मन-मुटाव की कारण जमीन-जायदाद का बंटवारा होगा और जितने हिस्सेदार होंगे,खेत के भी उतने ही छोटे-छोटे टुकड़े होंगे.फलस्वरूप फसल की पैदावार पहले की अपेक्षा घटती चली जायेगी।यही नहीं,आये दिन कई प्रकार के लड़ाई-झगड़े होते रहेंगे।माता-पिता के रहते भाइयों की यह लड़ाई व मन-मुटाव स्वयं माता-पिता के लिए भी दुखद एवं असहनीय बात बन जायेगी।

संयुक्त परिवार प्रणाली की लाहौल-स्पीति में प्रासंगिकता :
      राष्ट्रीय और प्रादेशिक परिपेक्ष्य में संयुक्त परिवार प्रणाली के बारे कुछ ब्यान कर पाना मुश्किल है,क्योंकि इस प्रणाली में जहां कई गुण हैं,वहाँ यह दोषों से भी मुक्त नहीं है।परन्तु जिला लाहुल-स्पीति के सन्दर्भ में यही कहा जा सकता है कि इस प्रणाली का कायम रहना ही श्रेयस्कर है क्योंकि जैसा पहले भी ज़िक्र किया जा चुका है कि सम्भवत:पूरे देश में सिर्फ यही ऐसा भू-खंड होगा,जिस की भोगोलिक,सामजिक और आर्थिक परिस्थितियाँ नितांत भिन्न हैं।जहां तपती गरमी और कडाके की ठंड में जीवन यापन करने का प्रश्न उठता है,तो कल्पना ही की जा सकता है कि अकेला आदमी किस तरह इन सारी प्राकृतिक विपदाओं से जूझ पाएगा।कभी बेमौसम बर्फबारी से फसलों का नष्ठ हो जाना तो कभी रास्तों की खराबी से फसलों से होने वाली आय का नुक्सान होना ,इत्यादि भी कई बार अकेले आदमी की जीवन-यापन पे असर दिखाते हैं। साल में छ:महीने ही तो काम का सीजन होता है और यदि इसी निश्चित अवधि में भी इकठ्ठे काम नहीं निपटाया गया तो समस्त फसल नष्ट हो जायेगी और समय पर साग-सब्जियां भी उगा नहीं पायेंगे।यदि बाहरी मजदूरों से यह सब कार्य करवाया जाता है तो उस की कीमत भी तो बहुत चुकानी पडती है।वैसे भी मजदूर आज-कल ऐसे इलाके में मिलते कहाँ हैं।

संयुक्त परिवार प्रणाली में विघटन के कारण :
        जहां संयुक्त परिवार प्रणाली में विघटन के कारणों की बात आती है तो यह कहना उचित नहीं होगा कि इस के पीछे सिर्फ जमीन-जायदाद के झगड़े हैं।गूढ़ विचार के पश्चात कई तथ्य सामने आये हैं।सर्वप्रथम,स्वार्थी मानसिकता इस विघटन का मुख्य:कारण है।घर का हर सदस्य चाहता है की उस की भी व्यक्तिगत सम्पति हो ताकि भविष्य में अन्य गृह सदस्यों द्वारा उस का शोषण ना हो।सरकारी नौकरियों एवं व्यवसाय में लगे परिवार  के सदस्य की तुलना अगर घर बैठे कृषि में लगे सदस्यों से की जाती है तो द्वितीय वर्ग अपने को सुखी महसूस नहीं करता।फलस्वरूप वे पारिवारिक विघटन को ही सार्थक समझते लगते हैं।नोकरी में लगे सदस्य शायद ही वापस लाहौल आ के  घर सम्भाल पाते हैं ,वे कहीं बाहर ही बस जाते हैं ।साथ ही यदि ,किसी घर में बहुत सारे युवा यदि बेरोजगार होते हैं तो वे भी हालात को देखते हुए अलग हो जाना ही सार्थक समझते हैं।वैसे भी पुरानी सामाजिक फिल्मों की तरह किसी परिवार के सभी सदस्य एक ही चूल्हे-चौके पे भोजन पका और खा रहें हो ,यह भी सभी समझते हैं कि आज सम्भव नहीं है।पड़ोसी जिला कुल्लू में भी जमीन,बगीचा,मकान खरीदने और बनाने की व्यक्तिगत लालसा और होड़ ने भी संयुक्त परिवार प्रणाली को विघटित करने पर मजबूर किया है।एक अन्य कारण है-सरकार की सत्य घोषणा "छोटा-परिवार,सुख का आधार"का संदेश लाहुली समाज के जनमानस के मन तक पहुंचना।

वर्तमान आर्थिक स्थिति और आवश्यकता :
      आज जिले की आर्थिक स्थिति पहले कि अपेक्षा कहीं अधिक बेहतर है.अपनी योग्यता से यहाँ के होनहार छात्र अच्छी नौकरियों और उच्च सरकारी पदों पे आसीन हैं।डाक्टर,इंजीनियर,आई.ए.एस,ठेकेदारी या अन्य कोई भी व्यवसाय हो ,सब जगह लाहौली लोग अपनी धाक जमा चुके हैं।आज अपने जिले से उठ कर दूसरे जिलों में भी घाटी निवासी अपनी जायदाद बना रहे हैं और पूँजी निवेश कर रहे हैं।वे वास्तव में वे अपनी पूँजी का विनियोग वास्तविक अर्थों में विशेष चीज़ों में कर रहे हैं।यह सब सुखद भविष्य का सूचक है कि कुछ लोग लाहौल में रहें और कुछ बाहर।इस तरह सब को समान रूप से तरक्की करने का मौका मिला है और भविष्य में भी मिलता रहेगा।आज आवश्यकता है की एक-दूसरे की मुश्किलात में सहायता करने की ताकि वे अपने को अलग-थलग महसूस न कर सकें।इस लिए किसी भी हालात में पारिवारिक विघटन की नोबत नहीं आनी चाहिए।अलग-अलग जगह में रहते हुए भी सब के विचार एक रहना चाहिए,सब की सम्पति सांझी होनी चाहिए,तभी सच्चे अर्थों में उन्नति हो पायेगी।

निष्कर्ष  :
      अंतत:विषय का निष्कर्ष इन्हीं शब्दों के साथ निकालना न्यायौचित होगा कि संयुक्त परिवार प्रणाली ही यहाँ की भौगोलिक एवं सामाजिक परिस्थितियों के सर्वथा अनुकूल है और श्रेष्ठ है।माना  कि समय के साथ संयुक्त परिवार प्रणाली की परिभाषा बदल चुकी है किन्तु इस प्रणाली को शिथिल करने की बजाए इसे नया रूप देना होगा,इसे सार्थक और ठोस बनाना होगा,तभी हर परिवार खुशहाल और सुखी होगा."जय लाहौल"।
(राहुल लारजे)

इतिहास के पन्नों से

गुरू महाराज का लाहौल आगमन और गुशाल गांव में सर्वोत्कृष्ट अविस्मरणीय सनातनी सुधार 
---राहुल देव लरजे
           
हिमालय के आंगन में बसे अन्‍य पहाड़ी क्षेत्रों की भान्ति हिमाचल प्रदेश राज्‍य का जनजातीय जिला लाहौल-स्पिति भी अपने विशिष्‍ट धार्मिक रिति-रिवाजों और परम्‍पराओं के लिए मशहूर है वैसे पारम्‍पारिक इतिहास पे सरसरी डालें तो ज्ञात होता है कि स्पिति इलाके में सातवीं सदी में बुद्व धर्म के आविर्भाव से वर्तमान समय तक लगातार मुख्‍यतः बुद्व धर्म का ही प्रभाव अधिक रहा किन्‍तु वहीं लाहौल की जब बात आती है तो यहां के विभिन्‍न घाटियों में बसे विभिन्‍न समुदाय के लोग पुरातन युगों से कई धर्मों के विशिष्‍ट प्रभावों की वजह से ढ़ुल्‍मढुला की स्थिति में रहे और फलस्‍वरूप पुरातन देवी-देवताओं के साथ-साथ सातवीं सदी में यहां बुद्व धर्म के आविर्भाव होने के साथ उस में भी जुड़ गए और धार्मिक आस्‍थाओं की परिपाटी में पटटन घाटी के लोग सदियों से ले कर वर्तमान समय तक सहिषूण बने रहे और जो भी उन्‍हें अच्‍छा लगा उसे अपने धार्मिक जीवन में समेकित किया वर्तमान समय में व्‍यक्तिगत धार्मिक आस्‍था के अनुसार उन्‍हें कई वर्गों या मतों में  बांटा जा सकता हैजैसे की महादेव यानि शिव को पूजने वाले,घेपन राजा और उन के परिवार से सम्‍बन्धित देवी-देवताओं में आस्‍था रखने वाले,बुद्व धर्म के अनुयायी,डेरा ब्‍यास के सतसंग मत को मानने वाले,रामश्रणनम,ब्रह्मकुमारी और गुरू महाराज यानि सनातन धर्म को मानने वाले आदि-आदि  
            
              वैसे एतिहासिक तथ्‍यों के आधार पर साफ तौर से यह प्रतीत होता है कि लाहौल के पटटन घाटी में प्राचीन समय के पारम्‍पारिक हिन्‍दू देवी-देवताओं को पूजने की प्रथा रही हैलगभग हर गांव में स्‍थानीय देवी-देवताओं का डेहरा यानि मन्दिर होता था लोगों की दैनिक जीवन शैली काफी हद तक इन के पूजन और धार्मिक अनुष्‍ठानों से प्रभावित रहती थी इन अराध्‍य देवी-देवताओं में अटूट आस्‍था के चलते लोगों का धार्मिक जीवन भी हमेशा इनसे प्रभावित रहता थागांव का मुख्‍य देवता एक प्रकार का न्‍यायधीशमूसीबत में राह दिखाने वालाचिकित्‍सक और भविष्‍यवक्‍ता था,जिस पर सभी गांव वासी निर्भर थे और उस को प्रसन्‍न रखने के लिए हर वर्ष किसी विशेष माह में पूजन पर्व का आयोजन भी किया जाता था। इन स्‍थानीय देवताओं की अवमानना करने से ग्रामवासी कतराते थे और उन्‍हें यह भय भी सताता था कि देव प्रकोप से उन्‍हें नुकसान न हो लोगों में यह आस्‍था थी कि नाराज होने पर देवी-देवता उन के परिवार के किसी सदस्‍य को बीमार कर सकते थे और आकाल मृत्यु के अतिरिक्‍त फसल आदि की कम पैदावार होने पर आर्थिक नुकसान का सामना भी उन्‍हें करना पड़ सकता था। अतः गांव के मुख्‍य देवता को प्रसन्‍न रखने में ही वह भलाई समझते थे प्राचीन कर्मकाण्‍डों और अन्‍धी आस्‍था के चलते इन देवताओं को प्रसन्‍न रखने के लिए धार्मिक अनुष्‍ठानों में भेढ़-बकरियों की बलि देना आम बात थी
गुशाल गांव
           ऐसी ही एक देवी जो माता तिल्‍लों या तिलोत्‍मा के नाम से विख्‍यात थी,को चन्‍द्रा एवं भागा नदी के संगम स्‍थल के नजदीक बसे गुशाल गांव में पूजा जाता था। प्राचीन शास्‍त्रों में यह कुल्‍लू क्षेत्र के हिडिम्‍बा देवी की भान्ति एक राक्षसी थी और उसे प्रसन्‍न रखने के लिए वर्ष में एक बार होम नामक पर्व मनाया जाता था जिस में हजारों भेढ़-बकरियों की बलि दी जाती थी। सबसे कठिन रिवाज गुशाल गांव से बाहर ब्‍याही गई स्‍ित्रयों के लिए था उन्‍हें पर्व के मौके पर अपने मायके यानि गांव के लिए बलि हेतू एक भेढ़ बलि हेतू लाना आवश्‍यक था इस तरह तिलोत्‍मा देवी की पूजा-अर्चना के साथ बलि हेतू चढ़ाए गए निरीह पशुओं की संख्‍या बहुत अधिक हो जाती थी स्‍थानीय लोगों के अनुसार तिल्‍लों देवी के मन्दिर के प्रांगण के पास के एक बहते हुए जल स्‍त्रोत के पास इन असंख्‍य निरीह भेढ़ों की जहां बलि दी जाती थी,वहां की सारी जमीन रक्‍त रंजित हो कर लाल हो जाती थी और लगातार बलि के फलस्‍वरूप बलि स्‍थल पर लगभग एक फुट जमे हुए रक्‍त की परत भी बन गई थी
           
            तिल्‍लोत्‍मा देवी के पूजन हेतू मनाए जाने वाले होम पर्व के अलावा गुशाल गांव में शर्द काल में योर नामक एक त्‍यौहार बड़े हर्षोउल्‍लास के साथ मनाया जाता था इस पर्व की मुख्‍य विशेषता यह थी कि इस दिन गांव के किसी घर के मन्दिरनुमा कमरों(गुशाल के चारपा घराने के घर में) में रखे गए लकड़ी के बने विशेष मुखौटों जिन्‍हें स्‍थानीय बोली में मोहरा कहते थे,को पारम्‍परिक रिति-रिवाज अनुसार बाहर निकाला जाता था और इन्‍हें पहन कर कुछ ग्रामीण गांव के मध्‍य एक जगह में बर्फ से एक विशाल शिव लिंगनुमा आकृति बना कर उस के इर्द्व-गिर्द्व गाजों-बाजों सहित एक विशेष प्रकार का सामुहिक नृत्य करते थे इस पर्व का आयोजन मुख्‍यतः प्रकृति पूजन हेतू किया जाता था और पूर्वजों की आत्‍माओं से धन-धान्‍य और सुख-समृद्धि की कामना भी की जाती थी इस पर्व के पश्‍चात तुरन्‍त मोहरों को पुनः मन्दिरनुमा बने कमरों में रख दिया जाता था.
          
            प्रचलित लोकगाथाओं के अनुसार गुशाल गांव के निवासी इन मोहरों से बेहद खोफ रखते थे और इन से छेड़खानी करने से भी कतराते थे वहां यह मान्‍यता थी कि इन मोहरों की नाराजगी जिसे स्‍थानीय बोली में ‘’नोसख्‍याल’’ कहते हैं,द्वारा उजागर होता था और उन्‍हें प्रसन्‍न रखने के लिए पूजा-अर्चना के अलावा उपाय भी करने पड़ते थे पुराने मुखौटे की जगह नया मुखौटा बनाने की सूरत में विशेषज्ञ उन्‍हें बेहद सावधानी से बनाते थे और निमार्ण के समय उन के मुख में सोने या चांदी जैसे अमूल्‍य धातू के कुछ कणों को भी जोड़ कर रखते थे अन्‍यथा बनाने वाले को भी घोर विपदा का सामना करना पड़ सकता था कुल मिला कर तिलोत्‍मा राक्षसी देवी के अतिरिक्‍त  इन मोहरों से भी गुशाल वासी बहुत ज्‍यादा खौफ खाते थे अतःइन्‍हें प्रसन्‍न रखने के लिए मनाए जाने वाले दो पर्व योर एवं होम गांव वासियों के लिए आस्‍था से ज्‍यादा उनके कोपभाजन से बचाव हेतू पूजन के प्रतीक थे जिसे निभाया जाना उनकी मजबूरी भी थी इन की पूजा अर्चना जैसे कर्मकाण्‍ड के बहाने हर वर्ष हजारों निरीह पालतू पशुओं को भी जान से हाथ धोना पड़ रहा था
              
                सन 1939 में ऐसे ही होम पर्व के अवसर पर जब गुशाल में ढेरों भेढ़ों की बलि ली जा रही थी तो एक सनातनी महापुरूष जिन्‍हें स्‍वामी ब्रह्मप्रकाश के नाम से जाना जाता है,गुशाल गांव में पधारे जब उन्‍होंने बिना दया के मासूम जानवरों को बलि पर चढ़ते देखा तो उन का हृदय करूणा से भर उठा और उन्‍होंने विचलित मन से ग्रामिणों को दया भाव दिखाने की लाख चेष्‍ठा की,किन्‍तु लोगों को टस से मस न होते देख उन्‍होंने वहीं रह कर हर हालत में सुधार लाने की ठान लीकहा जाता है कि स्‍वामी जी को उन के गुरू ने दीक्षा दी थी कि उस क्षेत्र को प्रस्‍थान करो जहां सबसे अधिक पाप हो रहा हो और यदि वह उस इलाके के लोगों में सुधार लाने में सफल रहते हैं,तो ही वास्‍तविक सनातनी माने जाऐंगे अतःइस उदेश्‍य से भी स्‍वामी ब्रहम प्रकाश लाहौल के गुशाल गांव में पधारे
स्‍वामी ब्रह्मप्रकाश ऊर्फ गुरू महाराज  

         स्‍वामी ब्रह्मप्रकाश का वास्‍तविक नाम जयवन्‍त राव था और महाराष्‍ट्र से तालुक रखते थे वह कब और कैसे सनातनी बनें इस के बारे में गुशाल वासियों को भी पूर्ण ज्ञान नहीं है कुल्‍लू एवं लाहौल आने से पूर्व वह ऋषिकेश के कोयल घाटी में रहते थे पहाड़ी इलाकों में बलि प्रथा,अन्‍धी आस्‍था और धार्मिक कर्मकाण्‍डों से लोगों को विमुख करने तथा उद्धार करने के उददेश्‍य से उन्‍होनें अपनी यात्रा आरम्‍भ की और कुल्‍लू में पहुंचे कहते हैं कि वह कुल्‍लू के रामशीला और वैष्‍णों माता मन्दिर के नजदीक एक गुफानमा जगह में कुछ समय अपने संगत के साथ रहे यहां पर वे स्‍थानीय लोगों को दीक्षा देते थे कुल्‍लू बाजार के स्‍थानीय लोगों ने सनातनी शिक्षाओं का मूल ज्ञान नहीं होने के कारण स्‍वामी जी के साथ झगड़ा भी किया क्‍योंकि कहा जाता है कि एक बार स्‍वामी जी ने दीक्षा देते समय यह कहा कि मैं सबका पति हूं यह बात स्‍थानीय लागों को जब नहीं जची तो उन्‍होनें स्‍वामी जी का विरोध करना शुरू किया बाद में किसी समझदार स्त्री ने स्‍वामी जी के मूल कथन का गहन तथ्‍य समझा कर उन्‍हें शान्‍त किया यहीं पे उन की शिक्षाओं से अभिभूत हो कर लाहौल के गुशाल गांव के कुछ लोग उन के अनुयायी बन गए और उन्‍होनें स्‍वामी जी से गुशाल गांव जा कर वहां सुधार लाने हेतू आग्रह किया स्‍वामी जी को लाहौल लाने में गुशालगांव के व्‍यांगफा घराने के स्‍व.श्री शिव राम,राणा घराने के स्‍व.श्री छेरिंग तंडुव और श्री दोरजे राणा (जो कुल्‍लू के मनसारी में रहते थे और लगभग 100 वर्ष की आयू में स्वर्ग सिधारे ) की मुख्‍य भूमिका रहीस्‍वामी ब्रहम प्रकाश मात्र एक लंगोट और धोती पहनते थे और इस तरह इन्‍हीं वस्‍त्रों में उन्‍होनें कम्‍पकम्‍पाती ठण्‍ड में पैदल रोहतांग दर्रा पार किया और सन 1939 में गुशाल पधारे
         
          उस समय गुशाल गांव में तिल्‍लों देवी की प्रतिष्‍ठा में होम का आयोजन किया जा रहा था जब स्‍वामी जी ने निरीह पशुओं को बलि पे चढ़ाते देखा तो उन का हृदय पसीज उठा और उन्‍होनें गुशाल गांव में इस प्रथा को समाप्‍त करने की ठान ली कहते हैं कि स्‍वामी जी बलि स्‍थल पर ध्‍यान मुद्रा में बैठ गए स्‍थानीय लोगों ने इसे पूजा-पाठ में विघ्‍न समझ उन पर बन्‍दूक से गोली मारनी चाही किन्‍तू ट्रिगर दब न सका वैसे ही किसी शख्‍स ने लाठी से उन पर वार करना चाहा तो उस से लाठी एक इंच भी उठाई न जा सकी इस तरह के विचित्र शक्तियों से प्रभावित हो का गांव वासी समझ गए कि स्‍वामी जी एक असाधारण व्‍यक्तितव के महात्‍मा हैं इस तरह कई लोग तुरन्‍त उन के चेले बन गए आरम्‍भ में स्‍वामी जी तांदी संगम स्‍थल के नजदीक चनाव नदी के किनारे एक तम्‍बू बना कर रहने लगे किन्‍तु बाद में गुशाल गांव के खाम्‍पा परिवार ने उन्‍हें अपने घर में पनाह दी उन के साथ प्‍याली बाबा नामक एक चेला भी हमेशा संगत में रहता था
           
           बाद में गुशाल गांव के राणा किशन दास ने उन्‍हें मन्दिर बनाने हेतू गांव में अपनी जमीन दी जो कि वर्तमान में वहां विद्यालय के नजदीक है स्‍वामी जी का जीवन बेहद सरल था और वह मात्र लवाड़ (लाहौल में बनने वाली काठू की चिल्‍लड़) और दही खा कर अपना पेट भरते थे.वह गुशाल गांव के उपर किसी विशेष चश्‍में का ही पानी ग्रहण करते थे उन में अचूक यौगिक शक्ति थी और कहा जाता है कि एक बार स्‍थानीय लोगों ने उन्‍हें गुशाल गांव में मंत्रोउच्‍चारण तथा हवन द्वारा साफ आसमान में भी बारिश बरसाते देखा गया वैसे ही एक हवन में जब घी से सना हुआ नारियल जब अग्नि आहूति में फट गया तो उस के छींटें सीधे स्‍वामी जी के मूंह एवं शरीर में गिरे किन्‍तु स्‍वामी का बिलकुल भी नुकसान नहीं हुआ और जख्‍म तुरन्‍त गायब हो गए स्‍वामी जी ने गुशाल वासियों को सनातन मत की तरफ आकर्षित करने के लिए नए विचार धर्मान्तरित परिवारों के हर घर में लगातार 21 दिन तक भी हवन जारी रखा उन्‍होंनें दीक्षा द्वारा उचित ज्ञान मार्ग दर्शन दिया और पूजापाठ करने के सरल उपायों से स्‍थानीय निवासियों को अवगत कराया उन की प्रेरणा से गुशाल वासियों ने पूजा हेतू यज्ञ व हवन आदि शुरू किया और भजन-कीर्तन द्वारा ही प्रभू उपासना प्रारम्‍भ करने की चेष्‍ठा की स्‍वामी जी अब गुरू महाराज के उपाधी से माने जाने लगे
                    
              गुरू महाराज के ज्ञान और दीक्षा प्रप्ति से अभिभूत हो कर गुशाल गांव के मात्र 6 परिवारों को छोड़ कर सभी उनके चेले बन गए वास्‍तव में स्‍वामी जी का अनुयायी बनने का अर्थ था कि मास और मदिरा से दूर रहना और लाहौल जैसे इलाके में जहां का वातावरण और भौगोलिक परिस्थियां बेहद भिन्‍न रही हैं वहां प्राचीन परम्‍पराओं के अनुपालन से विमुख होना और सनातन धर्म के नियमावली का सख्‍ती से पालन करने आदि में कुछ ग्रामीणों ने कठिनाई महसूस हुई स्‍वामी जी ने बरगुल और मूलिंग गांव के लोगों को भी सनातन धर्म की आकर्षित करने की चेष्‍टा की किन्‍तु वहां के लोगों के कठोर स्‍वभाव से विदित हो कर जान गए कि उन्‍हें काबू में नहीं लाया जा सकता उधर गुशाल के राणा घराने के किशन दास नामक व्‍यक्ति ने सनातनी बनने के बाद एक दिन योर त्‍यौहार हेतू निकाले जाने वाले सभी मोहरों को नदी में फैंकवा दिया क्‍योंकि यह सब बलि के प्रतीक थे और इस तरह वहां योर नामक पर्व मनाना भी हमेशा के लिए समाप्‍त हो गया तिल्‍लों देवी के मन्दिर के स्‍थान पर तुरन्‍त सनातनी मन्दिर की स्‍थापना की गई,इस तरह इस देवी के पूजन हेतू किए जाने वाले पशू बलि प्रथा पे भी लगाम लग गया
          गुशाल गांव के मुख्‍य घराने जो तुरन्‍त गुरू महाराज जी के चेले बने वह थे-भाट,राणा,खाम्‍पा,सुमनाम्‍पा,पुजारा,धेपा,व्‍यांग्‍फा,रोक्‍पा और बोकट्रपा आदि इन में राणा घराने के छेरिंग तण्‍डुप पक्‍के सनातनी बन गए थे और वह घर त्‍याग कर मनाली के नजदीक किसी गुफा में रहते थे
सनातनी औंकार स्‍तुति
सनातन धर्म वास्‍तव में हिन्‍दू धर्म का ही पुराना नाम है और इस में उन प्राचीनतम उच्‍च अध्‍यात्मिक सिद्वान्‍तों की नियमावली है जिस के दैनिक जीवन में अनुसरण द्वारा मोक्ष की वास्‍तविक प्रप्ति हो सकती है सनातन धर्म का प्रथम विवरण ऋगवेद में मिलता है जिसे कई ऋषि-मुनियों ने लिखा और उन्‍होंने गहन अध्‍यन के पश्‍चात ब्रहमाण्‍ड की सच्‍चाईयों को सृष्टि में जीवित और भौतिक वस्‍तुओं के सम्‍बन्‍धों का विस्‍तारपूर्ण तथ्‍यों सहित बखान किया है वास्‍तव में यह धर्म शब्‍द से भी उपर है और इस में जीवन यापन के नैतिक तौर तरिकों से लेकर समस्‍त सृष्टि के बारे में स्‍टीक ज्ञान दिया गया है इस में संस्कृत के दो शब्‍द ‘’अनादि’’ और ‘’आदि’’ के बारे में विस्‍तार से बताया गया है सनातन मतानुसार इस सृष्टि का निर्माण एक ‘’पुरूषया’’ द्वारा अनादि काल से हुई है जिस की कोई शुरूआत नहीं रही है
                                  गुशाल गांव में गुरू महाराज के सबसे प्रथम पक्‍के सनातनी चेले स्‍व.शिवराम व्‍यांग्‍फा,स्‍व.छेरिंग तण्‍डुव ऊर्फ राणा मेमे और श्री दोरजे राणा थे। इन के बाद स्व.टशी राम सुमनाम्‍पा,स्‍व.लाला बिशन दास भाट,स्‍व.देवी चन्‍द शासनी,स्‍व.राणा किशन दास,स्‍व.डुण्‍डू राम बोक्‍ट्रपा,स्‍व.शिवदयाल खाम्‍पा और श्री सुदामा राणा आदि थे। इन के अलावा कुछ स्‍थानीय स्‍ित्रयां भी गुरू महाराज की पक्‍की चेलियां बनी जिन के नाम थे-स्‍व.छिमे राणा दादी,स्‍व.ऊरग्‍यान बुट्री सुमनाम्‍पा और स्‍व.नोरो राणा सनातन धर्म की शिक्षाओं और पूजा हेतू यज्ञ-हवन के तौर तरिकों से प्रभावित हो कर गुशाल गांव के अलावा तांदी,ठोलंग,लोट और जहालमा गांवों के कुछ परिवार भी गुरू महाराज के अनुयायी बन गए और उन्‍होंनें मास-मदिरा आदि का सेवन त्‍याग दिया बाद में तिनन घाटी के दालंग और थोरंग गांव के कुछ परिवार भी सनातनी बन गए
हवन कुण्‍ड हेतू सनातनी ऊ छाप
        
          इस मत के अनुयायी घरों में इकटठे हो कर कीर्तन,भजन और हवन द्वारा ही सनातनी तौर तरीकों से पूजा करते हैं हर वर्ष गुशाल गांव तथा कुल्‍लू के 17 मील नामक जगह में जहां भी स्‍वामी जी का मन्दिर प्रतिष्‍ठापित है वहां हर वर्ष आठवें बेसाख यानि 20 अप्रैल को गुरू महाराज की बरसी धूम-धाम से मनायी जाती है और कई दिनों तक भजन-कीर्तन का दौर चलता रहता हैजुलाई माह में यज्ञ का भी आयोजन किया जाता है
        

          कहते हैं कि गुरू महाराज मात्र दो बार ही लाहौल पधारे थे और बाद में पंजाब के खन्‍ना में ही उन्‍होंनें अपना अन्तिम समय गुजारा यहां उन्‍होंनें एक बन्‍द गुफानुमा कमरे में कठोर समाधि ली और 108 वर्ष की उम्र में भौतिक शरीर को त्‍यागा कहते हैं कि इस कठोर समाधि में लीन के समय उन के पैरों और जांघों के मांस आपस में चिपक गए थे और टयूबरक्‍लोसिस नामक बीमारी से भी ग्रसित हुए थे
           
           गुरू महाराज एक महान सन्‍त थे और उन का मुख्‍य लक्ष्‍य लाहौल जैसे पिछड़े इलाके के लोगों के जीवन में व्‍यापक सुधार लाना,उन्‍हें निरीह जानवरों के बलि देने जैसे हिंसक प्रवृतियों से विमुख कराना और पूजा-पाठ के सरल नियमों से अवगत कराना था। लाहौल के गुशाल गांव के लिए उन का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि वहां पूर्व में आयोजित किए जाने वाले सामुहिक पशु बलि प्रथा का हमेशा के लिए खात्‍मा हो गया। इस सेवा कार्य के लिए उन्‍होनें अपना सारा जीवन अर्पण कर दिया इस भागीरथी कार्य को पूर्ण करने में वह काफी हद तक सफल भी रहे किन्‍तु जैसा कि विदित है कि सम्‍पूर्ण लाहौल इलाके में लोगों के धार्मिक जीवन में विभिन्‍न प्राचीन देवी-देवताओं का प्रभुत्‍व था,इसलिए व्‍यापक तौर पर लाहौली इस मत के अनुयायी नहीं बन सके
                                                             

(राहुल देव लारजे)         


 

सामाजिक विषय

लाहुल-स्पिति में शराब सेवन की परम्‍परा
--(राहुल देव लरजे)

       
ऐसा इलाका जहां शराब के बिना सारा कार्यक्रम अधूरा दिखता है। जीं हां,हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला लाहुल-स्पिति में शराब को इतनी ज्‍यादा तरजीह दी जाती है कि पूछिए मत। जैसा कि भारत के कुछ जनजातीय इलाके अपनी विशिष्‍ठ रिवाजों के लिए जाने जाते हैं तो लाहुल-स्पिति में भी सामुहिक समारोहों में शराब का सेवन और रिवाज आम है। शादी-विवाह का समारोह हो या कोई गेदरिंग,खेतों  से थक कर काम से लौटें हो या कोई मेहमाननवाजी, हर खास मौकों पर शराब परोसना यहां का रिवाज है। खाली समय में स्‍थानीय युवा समय व्‍यतीत करने के लिए ‘’गोची’’ यानि गेदरिंग करते हैं तो हल्‍की-फुल्‍की शराब का सेवन कर अपना मनोरंजन करते हैं। शादियों में तो पीने वालों की यहां पौ-बारह होती है। दरअसल परम्‍पराओं के अलावा लाहुल-स्पिति की जलवायू का असर भी यहां के खान-पान पर बहुत ज्‍यादा है। विशेषकर शीत ऋतु में व्‍यापक ठण्‍ड के चलते शराब का सेवन शरीर के तापमान को बनाए रखने के लिए जरूरी हो जाता है।

         शादी-ब्‍याह का समारोह तो लाहुल-स्पिति में बिना शराब के सोची ही नहीं जा सकती क्‍योंकि मेहमानों का स्‍वागत शराब से ही किया जाता है और खान-पान के दौर में शराब का सेवन बहुत ज्‍यादा होता है और बारातियों को छका-छका कर खूब पिलाई जाती है।युवा हों या बुढ़े सभी पी के धमाचोकड़ी मचाते हैं और एक-दूसरे का खूब मनोरंजन भी करते हैं। शराब चढ़ने के बाद नाचने-गाने से बारातीगण शादी में रौनक ले आते हैं और मस्‍ती से सराबोर वे ढोल-बांसुरी पर झूम गा कर सब के नजरों का केन्‍द्र बन जाते हैं। बारातियों को रास्‍तों के पड़ावों में पीने के लिए अलग से शराब ढोई जाती है जिसे ‘’लमछंग’’ कहते हैं। साथ ही मेहमानों और बारातियों के स्‍वागत में घरों के बाहर या कमरों में बैठने पर तुरन्‍त एवं खाने-पीने से पहले शगुन या शागुण भी किया जाता है जिसे मेजबान लोग पवित्र शुर या जूनिफर के पतों से शराब के छींटें बिखरा कर करते हैं। बारात में लड़के वालों की तरफ से शराब की भान्ति एक अन्‍य नशे वाली पेय पदार्थ जिसे लुगड़ी या चाक्‍ती कहते हैं को कुछ लड़कियां जो विशेष परिधान में होती हैं,‍रिवाज अनुसार बारातियों को स्‍वाद चखाती हैं। 
         

       परम्‍पराओं के अनुरूप लाहुल के कई इलाकों में शादी के समारोह में पीने-पीलाने का अपना-अपना विशिष्‍ट तरीका होता है। कुछ घाटियों में शराब पिलाने का जिम्‍मा हर कमरों में दो औरतों के जोड़ों को दिया जाता है जो बेहद आकर्षक पोशाक और शाल ओढ़े हुए होती हैं और वे कई बार बारातियों को शरारत में सुई चुभो कर एवं डरा कर भी पिलाते हैं। मकसद साफ रहता है कि खुशी के माहौल में बारातियों को खूब पिलाई जाए। यानि यह कहें कि साकी का महत्‍व ऐसे खास माहौल में बेहद ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण हो जाता है।


     लाहुल की परम्‍पराओं में शराब का महत्‍व इस कद्र है कि जब किसी के घर पुत्र जन्‍म लेता है तो बधाई स्‍वरूप शराब की बोतल ले जाने की परम्‍परा है जिसे कारछोल कहते हैं।यानि शराब के बिना सभी रस्‍में अधूरी हैं।


     प्रैक्‍टीकली कई बार यह भी देखा गया है कि शादियों में न पीने वालों की बजाए पीने वालों की सेवा खूब होती है। सेवादार या मेजबान लोग शराब पीने वालों को खाने-पीने के लिए मीट,चिकन और सलाद वगैरह पेश करते रहते हैं जबकि न पीने वालों को  महज मीठी चाय और स्‍थानीय नमकीन चाय के साथ सन्‍तुष्‍ठ रहना पड़ता है। शराब के नशे में झुलने पर पीने वाले गाते हैं,नाचते हैं और गप्‍पे  हांक कर एक-दूसरे  का मन बहलाते हैं जबकि न पीने वाले कोने में बैठ कर बोरियत से निहार कर मजबूरी में समय काट रहे होते हैं। 
  
             इस बात में कोई दो राय नहीं कि शराब पीने से आदमी खुल जाता है यानि उस की झिझक मिट जाती है और उसके व्‍यक्तित्‍व की एक दूसरी छवि देखने को मिलती है जो सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन करना और बांटना चाहता है। यहां एक बात साफ कर लें कि शराब की लत लगने पर हमेशा नशे के लिए पीना एक अलग बात है किन्‍तु वहीं  खास मौकों पे मनोरंजन के लिए खूब पीना बिल्‍कुल अलग बात है। जिस भी घर में शादी का आयोजन होना हो वहां पहले शराब के एरेन्‍जमेंन्‍ट की चिन्‍ता घरवालों को सताती है। देसी शराब और लुगड़ी  को तो घर में ही निकाला या बनाया जाता है किन्‍तु अंग्रेजी शराब के लिए स्‍थानीय लोग भागम-दोड़ी भी करते हैं और ठेकों से शराब भी धड़ल्‍ले से बिक जाता है।

      

     पूरे साल के 8-10 महीनों में जब यहां की मेहनतकश जनता खेतों-खलियानों में डटी रहती है तो अपनी थकान और मूड को शादी-ब्‍याह के समारोहों से बहलाती है और किसी के खुशी में शरीक होने पर खूब शराब का सेवन कर के अच्‍छा समय बिताना उन के लिए लाजमी बन जाता है।
    
   जैसे-जैसे लाहुल आर्थिक तरक्‍की की राह पर है वैसे-वैसे शादी-ब्‍याह के समाराहों में अंग्रेजी शराब के ब्रांड के स्‍तर में भी बदलाव देखने को मिल रहा है। किसी जमाने में डी.एस.पी. और अरिस्‍टोक्रेट परोसे जाते थे किन्‍तु आज प्रिमियम ब्रांड जैसे की रोयल स्‍टैग और रोयल चैलैन्‍ज आम हैं। कुछ घरों में धनसम्‍पदा और दिखावे के चलते अब पीटरस्‍कोट, बलेण्‍डरज प्राईड और टीचर तक के मंहगे और हाई ब्रांड भी परोसे जा रहे हैं यानि के लाखों रूपये अब इन मंहगे शराब की खरीददारी में लगाए जा रहे हैं।
 
         अब अंग्रेजी शराब पर फिजूलखर्ची के चलते लाहुल के अधिकतर इलाकों में ग्राम पंचायतों तथा महिला मण्‍डलों के सामुहिक प्रयासों द्वारा कुछ सख्‍त निर्णय लिए गए हैं जिस में यदि शादी वाले घर में अंग्रेजी शराब और बीयर को परोसते पाया गया तो 25 हजार रूपये तक का जुर्माना ठोकने का प्रावधान किया गया है। इस के लिए गाहर,तोद और चांग्‍सा घाटी के कई पंचायत और महिला मण्‍डल बधाई के पात्र हैं। कई बार कुछ धन सम्‍पन्‍न लोगों ने पारिवारिक प्रतिष्‍ठा के चलते इस तरह के जुर्माने राशी की भरपाई कर नियोजित रूप से अंग्रेजी शराब परोसा और पंचायत के निर्णयों की धज्जियां भी उड़ायीं किन्‍तु अब सख्‍ती होने से व्‍यापक असर देखने को मिल रहा है। इस तरह के निर्णयों से वास्‍तव में जनता का ही फायदा है। इस से फिजूलखर्ची भी कम हो रही है और लोकल शराब के अस्तित्‍व को भी उचित संरक्षण मिल रहा है।  स्‍थानीय शराब की महतता इस लिए भी है कि यह अग्रेंजी शराब की तुलना में ज्‍यादा घातक नहीं होता और बोतलों पे बोतल गट जाने के बाद भी आदमी सुफी हालत में रहता है जबकि उतनी ही मात्रा में इंगलिश शराब पीने वाले लुढ़क जाते हैं। यानि यह कहें कि शराब के नशे की डिग्री की तुलना में लाहुली शराब तुरन्‍त चढ़ती भी और उतर भी जाती है जो कि एक व्‍यस्‍त और जिम्‍मेदार आदमी के लिए अच्‍छा भी है।

       कई बार अंग्रेजी शराब की भान्ति बीयर को भी शादी- ब्‍याह में पानी की तरह परोसा जाता है जो कि बेहद गलत है। विशेषकर टीनऐजर अपनी उम्र का ख्‍याल करते हुए और बड़ों के समुख शिष्‍टता दिखाते हुए बीयर का सेवन करते हैं और उन की बढ़ती मांग को समारोह में पूरी करना मुश्किल हो जाता है। जैसा कि विदित है कि बीयर कीमती भी होता है और इस में नशे की डिग्री कम होने के कारण इस की खपत की सम्‍भावना भी ज्‍यादा रहती है यानि मांग और पूर्ति में सन्‍तुलन रखना बेहद कठिन हो जाता है। बीयर की बजाए लोकल लुगड़ी या छांग वास्‍तव में परोसी जानी चाहिए क्‍योंकि यह एक प्रकार जौ से बनी खुराक से प्रचूर पैय पदार्थ भी होती है और प्‍यास पर भी नियन्‍त्रण रखती है।

      लाहुल-स्पिति में शराब एक संस्कृति  का हिस्‍सा है तो यह कहना कुछ हद तक गलत नहीं होगा। यहां के स्‍थानीय प्रशासन तन्‍त्र को भी इस परम्‍परा के बारे में पूरा ज्ञान है और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्‍याओं और   प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पुलिस मेहकमों और एक्‍साईज डिपार्टमैन्‍ट को भी शायद लिखित हिदायत है कि एक्‍साईज ऐक्‍ट के दफाओं के अनुपालन में लाहुल-स्पिति को थोड़ी रियायत दी जाए। इस में यह प्रोविजन है कि लाहुल-स्पिति  की स्थानीय जनजातीय जनता यदि शादी-विवाह के समारोह हेतू घरों में देसी शराब बनाती है तो एक मात्रा तक बनाने और ले जाने की छूट भी दी जानी आवश्‍यक है और इसे गैर कानूनी नहीं माना जाएगा। यानि इस का तात्‍पर्य यह भी लगाया जा सकता है कि इस इलाके में शराब यदि बेचने की बजाए सामुहिक समारोह आदि में सेल्‍फ-कन्‍जमशन के लिए है तो गैर-कानूनी नहीं है।  

       आज पढ़े लिखे लोगों की संख्‍या लाहुल-स्पिति में दिन ब दिन बढ़ रही है और शराब पीने से होने वाली बीमारियों से वह वाकिफ भी हैं। शराब से न सिर्फ सेहत खराब होती है बल्कि घर भी उजड़ जाते हैं। इसकी लत लगने से आदमी का मानसिक और शारीरिक सन्‍तुलन नहीं रहता और धीरे-धीरे वह सब कुछ गंवा सकता है। लाहुल-स्पिति के सन्‍दर्भ में यहां की जलवायू और परम्‍पराओं को देखते हुए शराब महज कभी-कभार मनोरंजन एवं थकान मिटाने के उदेश्‍य से यदि जनता पीती है तो गलत नहीं है किन्‍तु इसे लत बना कर नशे के लिए रोज पीना सरासर गलत है। शराबी ज्‍यादा शराब पीने के चलते समाज में सब की नजरों से गिर जाता है और उस की इज्‍जत भी धीरे-धीरे गर्क में चली जाती है।रोजाना शराब पीने से जो आर्थिक नुकसान होता है उसकी भरपाई करना एक परिवार के लिए बेहद असम्‍भव होता है।

           मैं यहां यह लेख लिख कर शराब और शराबियों की तरफदारी नहीं कर रहा हूं बल्कि लाहुल
-स्पिति की इस विशिष्‍ट शराब पीने की परम्‍परा पर प्रकाश डाल रहा हूं जो कि बाहरी जनता के लिए भी अदभुत है। बस पीने वालों के कदम नहीं बहकने चाहिए,नेतिकता की डोर को लांघना नहीं चाहिए। साफ शब्‍दों में कहूं तो मनोरंजनके लिए कभी-कभार पीना उचित है किन्‍तु नशे के लिए सेवन बेहद घातक है। लाहुल के सन्‍दर्भ में भी शराब वास्‍तव में मनोरंजन के लिए ही है और सदियों से हमारे पूर्वजों ने कष्‍ठ झेल कर जिस तरह जीवन-यापन किया होगा और उन की मेहनत की वजह से आज जिस भूमि पर हम लोग गुजर-बसर कर रहें हैं,तरक्‍की कर रहे हैं वह दुनिया के लिए उदाहरण है किन्‍तु शराब के सेवन पर नियन्‍त्रण रखना हर स्‍थानीय जिम्‍मेवार व्‍यक्ति का कर्तव्‍य है अन्‍यथा अगली पीढ़ी उन्‍हें कोसेगी या उसी का अनुसरण कर गर्क में बढ़ती जाएगी। न पीने वालों के लिए तो बहुत ही अच्‍छा है किन्‍तु पीने वालों को इसकी लिमिट रखना बेहद ही आवश्‍यक है।
कैसे मिला लाहुल-स्पिति को जनजातीय दर्जा,
इतिहास के कुछ पन्‍ने मेरी डायरी से

---(राहुल देव लरजे) 


            भारत का संविधान लागू होने के उपरान्त सं 1952 में आज़ाद भारत में प्रथम चुनाव किए गए। लाहुल को पंजाब राज्य के कुल्लू संविधान क्षेत्र में रखा गया और 26 जनवरी का दिन वोट देने का दिन निश्चित किया गया। समस्त लाहुल वासियों के लिए कुल्लू के वशिष्ठ व स्पीति वासियों के लिए क्लाथ को पोलिंग स्टेशन बनाया गया। जैसा कि सर्दियों में जनवरी माह में बर्फबारी के कारण स्वाभाविक तौर पर बंद रहता है ,इसलिए चुनाव तिथि जनवरी माह में होने की वजह से लाहुल स्पीति के लोगों में बेहद निराशा थी।  उस समय कुल्लू पहुंचने के दोनों रास्ते जो कि रोहतांग और कुंजुम दर्रे थे,दोनों  शीतकाल में बर्फबारी की वजह से बंद थे।



Lahulians casting their votes
                                    ठीक इसी वर्ष जाहलमा गांव के लाहौर में शिक्षित युवा श्री शिव चंद ठाकुर और वरगुल के श्री देवी सिंह ठाकुर ने गलत समय में चुनाव कराए जाने की वजह से समस्‍त लाहौल वासियों को इन राष्‍ट्रीय चुनावों का बहिष्‍कार करने का आग्रह किया।23 मार्च 1952 को लाहौल-स्पिति वासियों के लिए चुनाव का दिन चुनने का निर्णय लिया।किन्‍तु यहां की जनता ने इस तिथि का भी घोर विरोध किया।ततपश्‍चात पंजाब राज्‍य सरकार के अनुरोध पर भारत सरकार ने स्थि‍ति का जायजा लेने का निर्णय लिया।
Thakur Devi Singh(Extreme left) & Thakur Shiv Chand(Extreme Right)
इन चुनावों के विरोध में कई जगह जूलूस भी निकाले गए।अन्‍ततःभारत सरकार ने जायज मांग को स्‍वीकार करते हुए पुनः

            अतःलाहौल के जनता के कुछ प्रतिनिधियों के दल को दिल्‍ली से बुलावा आया।ठाकुर देवी सिंह एवं शिव चंद ठाकुर तुरन्‍त दिल्‍ली रवाना हुए और वहां तत्‍कालीन प्रधानमन्‍त्री पंण्डित जवाहर लाल नेहरू,रक्षा मन्‍त्री सरदार वल्‍लभ भाई पटेल एवं कानून मन्‍त्री बी.आर.अम्‍बेदकर से मिले और उन्‍हें लाहौल-स्पिति की समस्‍या से अवगत कराया।उचित समय देखते हुए इन्‍होनें लाहौल-स्पि‍ति को संवेधानिक तौर पे जनजातीय दर्जा देने की मांग रख दी।

       प्रधानमन्‍त्री नेहरू ने स्‍िथ्‍ाति का वास्‍तविक जायजा लेने के लिए अपने निजी नुमायदे श्रीकान्‍त को लाहौल्‍ा भेजने का निर्णय लिया।जब श्री कान्‍त लाहौल पहुंचे तो वहां के पिछडेपन से रूबरू हुए।उन्‍होने देखा कि समस्‍त इलाके में सडक,बिजली और अस्‍पताल भी मुहया नहीं हुए थे।उन के अनुसार उस समय समस्‍त लाहौल घाटी में मात्र 4 स्‍कूल उपलब्‍ध थे।लाहौल की जनता ने उपयुक्‍त समय देखते हुए उन से एक अलग जनजातीय परिषद की मांग भी उन के समक्ष रख दी।

Mape of lahul-Spiti
             अपनी लाहौल यात्रा के पश्‍चात श्रीकान्‍त ने अपनी रिपोर्ट दिल्‍ली में भारत सरकार को सौंप दी।अन्‍ततःसन 1956 में अनुसूचित जनजातीय अधिनियम संशोधन के द्वारा भारत सरकार ने लाहौल-स्पिति को जनजातीय जिला घोषित कर दिया।इस के 4 वर्ष के पश्‍चात सन 1960 में इसे पंजाब राज्‍य के एक पृथक जिले का दर्जा दिया गया।इस से पूर्व य‍ह कुल्‍लू जिले का एक तहसील मात्र था।

      सन 1966 के पंजाब पुर्नगठन अधिनियम के द्वारा पुनःलाहौल-स्पिति को जनजातीय क्षेत्र का दर्जा दोहराया गया और यह हिमाचल राज्‍य का एक सम्‍पूर्ण हिस्‍सा बना।इस के पश्‍चात सन 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्‍य का दर्जा मिलने से सन 1975 में चम्‍बा लाहौल का क्षेत्र जिस में उदयपुर से तिंदी तक का इलाका आता था,को भी लाहौल में जोड दिया गया।ततपश्‍चात लाहौल जिला को भारतीय संविधान के समय-समय के जनजातीय आदेशों के तहत एवं अनुसूची 342(1) के अनुसार जनजातीय क्षेत्र का दर्जा दिया जाता रहा है।